जानें सोमवती अमावस्या का महत्व और पूजन विधि !……………

हिंदू पौराणिक शास्त्रों में सोमवती अमावस्या को बहुत ही महत्वपूर्ण दर्जा दिया गया है। माना जाता है कि इस दिन जो कोई भी पूजा पाठ करता है उसे विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। सिर्फ इतना ही नहीं, सोमवती अमावस्या का महत्व सूर्यग्रहण के बराबर माना जाता है। इस वर्ष सोमवती अमावस्या 20 जुलाई 2020, सोमवार के दिन पड़ रही है।


सोमवार को पड़ने वाली अमावस्या को सोमवती अमावस्या कहते हैं। हिंदू कैलेंडर के अनुसार अमावस्या उस दिन को कहा जाता है जिस दिन चंद्रमा पूरी तरह से लुप्त हो जाता है और रात में अंधेरा छाया रहता है। सोमवार को पड़ने वाली सोमवती अमावस्या को बेहद ही पुण्य फलदाई माना गया है। 

अमावस्या का महत्व


ज्योतिष शास्त्र और धार्मिक दृष्टि से अमावस्या की तिथि बेहद महत्वपूर्ण होती है। इस दिन पितृदोष से मुक्ति पाने के लिए विशेष पूजन भी किया जाता है। इस दिन तर्पण, दान आदि भी किए जाते हैं। हिंदू धर्म का प्रमुख त्यौहार दीपावली भी अमावस्या को ही मनाया जाता है और सूर्यग्रहण भी इसी तिथि को लगता है। कहा जाता है कि अगर किसी भी इंसान की कुंडली में सर्प दोष है तो इस दोष से मुक्ति के लिए उसे भी अमावस्या तिथि के दिन पूजा पाठ करने का विधान बताया जाता है।

सोमवती अमावस्या के दिन भगवान शिव की पूजा और उपासना का विधान बताया गया है। इस दिन का विशेष महत्व होता है।अमावस्या के दिन सूर्य और चंद्रमा एक सीध में होते हैं इसीलिए यह पर्व और भी ज्यादा पुण्यदाई बन जाता है। कुछ लोग सोमवती अमावस्या के दिन व्रत भी रखते हैं। इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र की कामना करते हुए व्रत रखती हैं। इसके बाद पीपल के पेड़ में शिव जी का वास मानकर उसकी पूजा और परिक्रमा करती है।

इस साल नहीं कर सकेंगे गंगा स्नान


सोमवती अमावस्या के दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व बताया गया है। हालांकि इस साल कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण को देखते हुए पहले ही सावन में होने वाली कांवड़ यात्रा को रद्द कर दिया गया था और अब सोमवती अमावस्या पर भी श्रद्धालु हरिद्वार में गंगास्नान नहीं कर सकेंगे।  प्रशासन ने स्पष्ट आदेश दिया है कि जिले की सभी सीमाओं को सोमवती अमावस्या से ठीक एक रात पहले से ही बंद कर दिया जाए और दूसरे राज्यों से आने वाले लोगों पर इस दौरान पूरी तरह से प्रतिबंध रहेगा।  

जो लोग इस दिन गंगा स्नान नहीं कर सकते हैं वह किसी भी पावन नदी या सरोवर में स्नान कर सकते हैं। अगर आप वह भी नहीं कर सकते तो इस दिन घर में ही रहकर स्नान के पानी में गंगाजल मिलाकर नहाने से भी पुण्य प्राप्त होता है। स्नान के बाद तिल से बनी हुई चीजें, तिल का तेल, आंवला और काजल इत्यादि दान किया जाता है।

सोमवती अमावस्या के दिन भगवान शिव की पूजा की जाती है। इस दिन पिंडदान करने की परंपरा का पालन किया जाता है। इसके अलावा जिन लोगों की कुंडली में चंद्र कमज़ोर स्थिति में होता है उनको सोमवती अमावस्या के दिन गाय को दही और चावल खिलाने की सलाह दी जाती है। इससे कुंडली में मौजूद चंद्रमा का दोष कम होता है।

सोमवती अमावस्या व्रत कथा


इस दिन के बारे में प्रचलित एक कहानी के अनुसार एक ब्राह्मण हुआ करता था। ब्राह्मण की एक कन्या थी। सर्वगुण समपन्न होने के बावजूद उसका विवाह नहीं हो पा रहा था। एक बार एक साधु उस ब्राह्मण के घर आया और कन्या के स्वभाव से बेहद प्रसन्न हुआ। उन्होंने कन्या को लंबी आयु का वरदान दिया।

तब ब्राह्मण ने साधु से अपनी कन्या के विवाह के बारे में पूछा। साधु ने कहा कि कन्या के हाथ में विवाह रेखा तो है ही नहीं। ब्राह्मण ने साधु से पूछा इसका क्या उपाय है? तब साधु ने कहा कि पास के गांव में एक सोना नाम की धोबिन का परिवार रहता है। अगर आप की कन्या वहां जाकर धोबिन की सेवा करें और खुश होकर धोबिन उसे अपना सुहाग दे दे तो इससे आपकी कन्या का विवाह हो सकता है।

इसके बाद कन्या ने धोबिन के घर जाकर उसकी सेवा का प्रण लिया। इस दिन के बाद से रोज सुबह सूर्योदय से पहले कन्या धोबी के घर जाती, वहां सारा काम करती और चुपचाप अपने घर वापस आ जाती। घर का सारा काम हुआ देख धोबिन को बड़ी खुशी मिलती है। उसे लगता था उसकी बहु सारा काम करती है। एक दिन उसने अपनी बहू से कहा कि तुम कितनी अच्छी हो तुम घर का सारा काम निपटा देती हो।

तब उसकी बहू ने उससे कहा कि ऐसा नहीं है मैं तो सोती रहती हूं। तब दोनों के मन में सवाल उठा कि आखिर घर का काम कर कौन रहा है? अगले दिन यह जानने के लिए दोनों इंतजार करने लगी तभी उन्होंने देखा कि एक कन्या आती है घर का सारा काम करती है और चुपचाप चली जाती है।तब धोबिन ने उससे पूछा कि तुम कौन हो? और यह सब क्यों कर रही हो?

कन्या ने धोबिन को अपनी सारी कहानी कह सुनाई। इस पर सोना को कन्या पर दया आ गई और अगली सुबह उसने सुहाग देने की बात कही। अगला दिन सोमवती अमावस्या का दिन था। सोना को इस बात की जानकारी थी कि अगर उसने कन्या को अपना सुहाग दिया तो उससे उसके पति का देहांत हो जाएगा, लेकिन फिर भी उसने अगले दिन व्रत किया, कन्या के घर गई और कन्या की मांग में सिंदूर लगा दिया। ऐसा करते ही उनके पति की मृत्यु हो गई। लौटते वक्त सोना ने पीपल के पेड़ की परिक्रमा की। जब वह घर लौटी तो उसने देखा कि उसका पति जिंदा है। उसने ईश्वर को आशीर्वाद दिया तभी से इस दिन व्रत करने की परंपरा की शुरुआत हुई।

धन्यवाद।